कश्ती 🛶

ज़िन्दगी की इस कश्ती में,
इस कदर उलझे है हम।
ना दोस्त को समझ पाए,
ना उसके प्यार को।।

समझा तो हमने तब,
समझा तो हमने तब उसे,
जब छोड़ गया किसी किनारे हमें,
कई सवाल मन में लिये।
दो लफ्ज़ कहे उसने,
“रास्ते ही अलग है हमारे, फिर कश्ती क्यों एक है?”

ज़िन्दगी की इस कश्ती में,
इस कदर उलझे है हम।
ना दोस्त को समझ पाए,
और शायद नाही उसकी दोस्ती को ।।

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निगाहें👀

दिल के विराने में ,तुम कहीं दुपक कर बैठे हो,
जैसे किसी बच्चे ने , देख लिया किसी हैवान को।
ना कुछ बोलते हो,ना कुछ सुनते हो,
बस अपने ही धुन में बढ़े जाते हो।।
अपने निगाहें ज़रा इस तरफ भी कर दो,
क्या पता कब ये ज़िन्दगी अथुरी छूट जाए तुम्हारी यादों में।

This poem is inspired

By-Mustaf Zahid(Film-awarapan)

रूह🌸